गाँवो देहातों पर गहराते महामारी के काले बादल

पश्चिमी उत्‍तरप्रदेश - अमरोहा ज़िला गन्ने की खेती के लिए विख्यात है। लगभग सारी ज़मीन में गन्ना उगाया जाता है। गेहूं, धान, दलहन वगैरह जो दूसरी फसलें बोई जाती हैं उन्हें काटकर भी गन्ना ही बो दिया जाता है। सत्तर के दशक में जब गांव में लोगो को रहना होता था तब प्रतिशत इतना नहीं था। आज खेतों में देखा जाये तो, एक भी ईख के खेत में कोई बीमार पौधा नहीं है, सब एकदम झकास हरे भरे। लोगो से इसका कारण जानने को मिला कि अब गन्ने की खेती में रासायनिक खाद जितना ही खर्च कीटनाशकों- ख़तरनाक़ ज़हरीली दवाईयों का है जैसे कोराजेन (Corazen), जिसकी क़ीमत ₹1800 की 100 ग्राम है जिसके छिड़काव से कोई भी कीट बच नहीं सकता, सालों तक ज़मीन में पैदा नहीं होता। 

ये जहर ज़मीन में मौजूद पानी में घुलता जा रहा है साल दर साल। दूसरी ओर बगैर सीवर लाइन के, शौचालयों का निर्माण जिससे मल सीधा ज़मीन के पानी में घुलता जा रहा है। पानी बिल्कुल पीने लायक़ नहीं बचा है।

गाँव के लगभग आधे घरों में RO संयंत्र लगे हुए हैं। आर ओ के लिए बहता पानी चाहिए, मतलब छत पर टंकी चाहिए, मतलब बोरिंग और पम्प चाहिए। पानी स्तर जितना नीचे जाता जा रहा है, बोरिंग खर्च उतना ही ऊपर जाता जा रहा है। सीमांत किसान और खेत मज़दूर इस स्थिति में नहीं कि ये सब व्यवस्था कर सकें। 

अभी भी हैंड पम्प का पानी पीने को मज़बूर हैं। नतीज़तन कैंसर, टी बी, जॉन्डिस, मानसिक रोग, हड्डियों के रोग जैसी भयानक जान लेवा बीमारियों की महामारी जैसी स्थिति पैदा हो रही है। इलाज के नाम पर जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हमारे स्कूली दिनों में पास के जोया क़स्बे में आबाद हुआ करता था वो भी बंद पड़ चुका है। महामारी के काले बादल घुमड़ रहे हैं। पीने को ज़हरीला पानी, मंहगे जानलेवा रोग यही है, पूंजीवादी विकास की कहानी।

एक बहुत कष्टकारक काम अंजाम देना पड़ा। एक ग्रामीण सोशल साइट की मदद से बता था कि वो अपने मित्र की 20 वर्षीय बेटी की कैंसर से हुई मौत पर सांत्वना देने उसके घर जाकर आया। कितना मुश्किल है; ख़ुद के आंसू रोकने में हो रही कठिनाई के बावजूद उसे और उसकी पत्नी को ना रोने के लिए बार बार कहना।
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