हम सब राजनीतिक दायरे में अच्छे और गलत को भूलते जा रहे हैं सब पार्टीबाजी में कोंग्रेस बीजेपी वामपंथी हो चले हैं इसलिए जानना भी जरूरी है कौन सही कौन गलत यह लेख जो नीचे हैं यह गूगल, विकिपीडिया आंकड़ो की मदद के साथ साथ मेहनत की आवाज पत्रिका के 7 वें अंक से भी लिखा गया है इसमें वामपंथ की कई पार्टियों को उजागर किया गया है मेरा मानना है कि एक भारतीय बनना बहुत मुश्किल है बीजेपी भक्त कोंग्रेसी चमचा और वामपंथी बनने के मुकाबले इसलिए थोड़ी मेहनत करें और आपने आपको स्वतंत्र रखे गलत को गलत सही को सही देखने और स्वीकार करने के लिए।
- किशन कुमार जोशी
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| किसानों और मजदूरों की बात करने वाली पार्टियाँ की वास्तविकता कुछ औऱ ही है |
किसान मेहनतकश मजदूर वर्ग की बात कर अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति करने वाली संसद में विराजमान यह वामपन्थी पार्टियाँ असल मे किनकी पार्टियाँ हैं यह पार्टियाँ लाल झंडे उठाये किसका हित सोचती हैं? अगर आप किसान और मजदूर की मानते हैं तो आप गलत हैं क्योकि वर्तमान में यह पार्टियाँ केवल उनके नाम को इस्तेमाल करती है और वास्तविकता में किसान और मजदूर को छलती है।
देश की संसद में मौजूद मज़दूरों और किसानों की बात करने वाली कुछ संसदीय वामपन्थी पार्टियाँ असल में पूंजीपतियों के ही विभिन्न हिस्सों के लिए कार्य करती हैं न कि किसान मजदूर मेहनतकश के लिए। आप इनका इतिहास पढ़ सकते हैं इतिहास भी इन संशोधनवादी पार्टियों की गद्दारी का गवाह रहा है! इन पार्टियों ने हमारे सामने ऐसी छवि बना रखी कि यह पूंजीवाद की दुश्मन है लेकिन असल मे यह पूंजीवाद की रक्षा करती वो भी मजबूती से इसलिए इनकी वास्तविकता सभी को समझनी चाहिए।
आज के अस्तित्व में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन यह तमाम वामपंथी पार्टियाँ अपने प्रचार व जनता को मूर्ख बनाने के लिए बात तो मजदूर वर्ग की करती हैं, लेकिन असल में कार्य छोटे मालिकों, छोटे उद्यमियों, छोटे व्यापारियों, बड़े किसानों जो खेत में काम करवा कर बड़ा माल कमाते हैं और मजदूरों के एक बेहद छोटे-से हिस्से, यानी संगठित क्षेत्र में काम करने वाले पक्के कर्मचारियों, के वर्ग के लिए करती हैं। और यही इनकी वास्तविकता है आप खुद अपने आस पास के वामपंथी सत्ता के धनी को बारीकी से देख लें। मैं कुछ घटनाओं के हवाले से बताता हूँ कि यह पार्टियाँ कैसे मूर्ख बनाती है।
आपने देखा होगा कि पश्चिम बंगाल में अपनी भूतपूर्व सरकार के दौरान इन्होंने टाटा की नैनो कार का कारखाना लगवाने के लिए मजदूरों, गरीब किसानों और आदिवासियों के हितों पर बर्बरता से हमला किया और उनके विरोध को क्रूरता से कुचला। यही काम इस तथाकथित ‘कम्युनिस्ट सरकार’ ने लालगढ़ में आदिवासियों और गरीब किसानों और नन्दीग्राम में गरीब किसानों के खिलाफ किया। जिस जिस जगह पर वामपंथी (मुख्यतः माकपा व भाकपा) की सत्ता रही है वहाँ इन्होंने बड़े पूँजीपति वर्ग की सेवा में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जमकर भक्ति की है, बीजेपी को पूंजीपतियों की गुलाम बोलने वाली यह पार्टियाँ असल मे बीजेपी की तरह ही पूँजीपति वर्ग हित के लिए कार्य करती हैं।
बुद्धदेव भट्टाचार्य जो सन 2000 से 2011 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे और जाधवपुर विधानसभा क्षेत्र से 14 मई 2011 तक विधायक रहे औऱ फिर अपनी पार्टी के मुख्य सचिव से हार गए वो भी 16684 वोटो से दरअशल यह मजदूरों और किसानों को बहलाते हुए कहते थे कि पूँजीपतियों के विरुद्ध हड़तालें आदि करने का युग बीत गया और आज का युग पूँजीपतियों के साथ ‘‘हाथ मिलाकर’’ चलने का है। हमारा मानना है कि मजदूर और मालिक कभी हाथ नहीं मिला सकते। उनके बीच एक करार होता है, जिसके तहत मजदूर अपनी श्रम शक्ति मालिक को बेचने को मजबूर होता है, क्योंकि कारखानों, खानों-खदानों आदि का मालिकाना मालिक के पास होता है, मालिक उसकी श्रम शक्ति का दोहन कर उत्पादन करता है, मुनाफा कमाता है और बदले में मजदूर को मुश्किल से जीने लायक खुराक देता है। ऐसे दो वर्गों में किस प्रकार का दोस्ताना हो सकता है? लेकिन ये तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियाँ आज मजदूरों को मालिकों से वर्ग सहयोग की नसीहतें दे रही हैं। मैं विशेष हाड़तोड़ मेहनत करने वाले मजदूरों के लिए कह रहा हूँ मार्केट में कोट पहन मार्केटिंग करने वालो को नहीं।
इनके मुँह से यदि कभी बड़े, कॉरपोरेट पूँजीपति वर्ग के खिलाफ़ दो शब्द निकलते भी हैं, तो बस इसलिए क्योंकि ये छोटे पूँजीपति वर्ग, व्यापारी व उद्यमी वर्ग की नुमाइन्दगी करते हैं और इस बात को लेकर सिरदर्दी रखते हैं कि यदि बड़े पूँजीपति वर्ग की बेलगाम लूट पर थोड़ी लगाम नहीं लगायी गयी तो व्यापक मेहनतकश-मजदूर आबादी बगावत पर उतर आयेगी और ‘औद्योगिक शान्ति’ और उत्पादन भंग हो जायेगा तो पार्टी को फंड और हमारी पेट पूजा कैसे होगी। इसीलिए ऐसी पार्टियों के नेतागण हमेशा केन्द्रीय सरकार और बड़े पूँजीपति वर्ग के कन्धे पर बैठे बेताल के समान उनके कान में लूटने में थोड़ा संयम बरतने का मन्त्र उच्चारते रहते हैं, जबकि असली लड़ाई उस व्यवस्था के ही समूल नाश की है जिसमें देश के 84 करोड़ उत्पादक वर्गों के पास उत्पादन के साधन ही नहीं हैं, जबकि जो एक सूई तक नहीं बनाते, वे समूचे कल-कारखानों, खानों-खदानों और खेतों-खलिहानों के मालिक बने बैठे हैं।
भाकपा (माले) लिबरेशन भी भाकपा व माकपा के समान ही जनता और मेहनतकश वर्ग को मूर्ख बनाती है इस पार्टी ने मजदूर वर्ग से जम कर गद्दारी की है छोटे पूँजीपति वर्ग, छोटे व्यापारियों, छोटे उद्यमियों, धनी और मँझोले किसानों, और संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों में से स्थायी कर्मचारियों के हितों की नुमाइन्दगी इसका पेशा है यह परिवर्तन और इंक़लाबी रास्ते को छोड़कर संसदवादी बन चुकी है। यह भी उन्हीं वर्गों के हितों की नुमाइन्दगी करती है, जिनकी कि भाकपा और माकपा करते हैं। यह जुमले ज्यादा गर्म इस्तेमाल करती है बीजेपी की तरह, लेकिन धुर अवसरवाद में इसका कोई सानी नहीं है क्योंकि यह दो मिनट में माइंड वॉश कर सकती हैं।
सन्दर्भ - गूगल विकिपीडिया, मेहनतकश की आवाज पत्रिका, मजदुुर बिगुल, नोजवान सभा ब्लॉग,
-✍️किशन कुमार जोशी


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